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ऋग्-भेद: भाग—1/1


!!1!! जम्बुद्वीप के "स्वर्ग-नगरी/कश्मीर" मे पहुँचकर वहा बसने के इरादे से आर्यों ने बुद्ध सम्राट अग्नि-स्वयंभूव से निवेदन किया।

!!2!! सम्राट अग्नि-स्वयंम्भूव की अनुमति से उसने वर्षों तक स्वर्ग में व्यतित किया। इसके उपरान्त उसने अपने अन्य साथियों को भी वहा बसाने के लिए स्वयंभूवों से प्रार्थना की।

!!3!! अग्नि-स्वयंभूव ने आर्यों के अन्य साथियों को भी अपने राज्य मे आकर बसने की अनुमति दे दी। साथ ही आजिविका उपार्जन व कृषि के लिए उन्हें साधन भी उपलब्ध कराया। इस प्रकार बाद मे आने वाले यजमानों के नजरों मे पूर्व में आकर बसने वाले यजमान यश के भागी बने। साथ ही पहले से बसे आर्य यजमानों ने बाद मे आए हुए बहादुर आर्य यजमानों के साथ संबंध स्थापित करने लगे।

!!4!! कलान्तर मे धन-बल से सम्पन्न हो जाने के बाद आर्यो द्वारा स्वर्ग/कश्मीर हरपने की षड्यंत्र की जाने लगी। एक सोची समझी साजिस के तहत चूपके से श्रमणों के आश्रयों मे आग लगाई जाने लगी। अर्थात् आर्यों द्वारा श्रमणों को इस प्रकार छत्ती पहुचाई जाने लगी जो प्राकृति आपदा जैसा प्रतित हो, ताकि बिना हिंसा भरकाए श्रमणों के राज्यों पर सहज कब्जा किया जा सके।

!!5!! इसी क्रम मे कुछ ज्ञानी आर्यों ने प्राकृत, पालि व तमिल भाषाओं के नकल करते हूए "संस्कृत" भाषा बनाई। फिर कुछ ज्ञानी आर्यों ने यज्ञ के होता बनकर "यज्ञ परम्परा" की शुरूआत किया, जिसके अंतर्गत षड्यंत्रकारी मंत्रोच्चारण के साथ अग्नि कुण्ड में अनाजों को जलाया जाने लगा।

!!6!! धीरे-धीरे यज्ञ के अग्नि-कुण्ड में अन्न के अलावे दुध, घी इत्यादि भी अर्पित किया जाने लगा । साथ ही इस प्रकार यज्ञ एवं हवन करने वाले यजमानों को अग्नि-देव के कृपा-पात्र होने की दावा भी किया जाने लगा। जिसके चलते कुछ अशिक्षित श्रमण लोग इनसे प्रभावित होने लगे।

!!7!! अब आर्यों के साथ-साथ कुछ श्रमणों ने भी यज्ञ करना प्रारंभ कर दिया। आर्यों के बनाए नियमों के अनुसार दिन व रात दोनों समय अग्नि-कुण्ड मे अनाजों की आहूतियाँ दी जाने लगी। साथ ही ऐसा करने वाले यजमानों व श्रमणों को अग्निदेव की कृपा-पात्र बताया जाने लगा, जिसके फलस्वरूप उनका आश्रय आग मे जलने से बच जाते।

       अर्थात् जो आर्यों की बात मानकर अग्नि-कुण्ड मे अन्न, दुध, घी इत्यादि का हवन करते उस पर अग्निदेव की कृपा-दृष्टी होती और उसके आश्रयों में आग नही लगती। लेकिन वही जो आर्यों की बात नही मानते व अग्नि-पुजा नही करते उसके आश्रयों में आग लग जाती थी। या कहे तो आर्यों द्वारा चुपके से उसके आश्रयों मे आग लगा दी जाती और बताया जाता कि अग्नि देव के पूजा न करने से रूष्ट होकर अग्नि देव नेे उसके घर जला दिये। ताकी वो भी डरकर अग्निदेव की पुजा करने लगे। ताकी स्वर्ग के श्रमण दाना-दाना के लिए मोहताज हो जाये और इस प्रकार इनकें राज्यों पर सहज कब्जा किया जा सके।

!!8!! फिर अग्नि को ईश्वर के साथ-साथ ज्ञान का प्रतिक एवं कर्मफलदाता भी बताया जाने लगा। जिसके चलते श्रमणों को स्वयंभूव के न्याय-सिद्धाँत पर संदेह होने लगा।

!!9!! जिस प्रकार पुत्र को जन्म से ही उसके पिता का साथ होता हैं और उसे अपने पिता को पाने के लिए कोई कष्ट, संघर्ष या हिंसा करने की आवश्कता नही होती। उसी प्रकार आर्यों ने बिना हिंसा किये "कपट-निति" से श्रमणों के राज्य (स्वर्ग) को सहज प्राप्त करने का प्रयास किया।

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