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मूलनिवासी नायक

🕚जटायु वाहन—
जाटों के नायक कृष्ण थे। वे एक कर्मयोगी थे। इसलिए आर्य-ब्राह्मणों के ढोंग का हमेशा भण्डाफोर कर देते थे। तब जाट-समाज कृष्ण के इसारों पर ही चलता था। कृष्ण के बात मानकर जाटव/यादव सामाज ने ब्राह्मणों की ढोंग त्याग कर बौद्ध श्रमण-संस्कृति के अनुसार प्राकृति पुजक बन गये । जिसके चलते कृष्ण आर्यों के आँखों मे खटकने लगे। एक दिन आर्यों ने यमुना (अंशुमति) नदी के किनारे बसे जाटव-सामाज पर अचानक आक्रमण करके कृष्ण और उनकी पत्नि समेत हजारों जाटों की नरसंहार कर डाली। फिर बचे-खुचे जाट-सामाज आर्य-ब्राह्मणों के गुलाम बना लिये गये।

👉देखीये प्रमाण ऋग्वेद मे दिया हैं—
➡ऋग्वेद मंडल-1 सूक्त 130 के 8 वें श्लोक में कहा गया है कि—
       
       ”हे इंद्र! युद्ध में आर्य यजमान की रक्षा करते हैं। अपने भक्तों की अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले इंद्र उसे समस्त युद्धों में बचाते हैं एवं सुखकारी संग्रामों में उसकी रक्षा करते हैं। इंद्र ने अपने भक्तों के कल्याण के निमित्त यज्ञद्वेषियों की हिंसा की थी। इंद्र ने कृष्ण नामक असुर की काली खाल उतारकर उसे अंशुमती नदी के किनारे मारा और भस्म कर दिया। इंद्र ने सभी हिंसक मनुष्यों को नष्ट कर डाला।”

➡ऋग्‍वेद के मंडल-1 के सूक्त 101 के पहले श्लोक में लिखा है कि—

         ”गमत्विजों, जिस इंद्र ने राजा ऋजिश्वा की मित्रता के कारण कृष्ण असुर की गर्भिणी पत्नियों को मारा था, उन्हीं के स्तुतिपात्र इंद्र के उद्देश्य से हवि रूप अन्न के साथ-साथ स्तुति वचन बोला। वे कामवर्णी दाएं हाथ में बज्र धारण करते हैं। रक्षा के इच्छुक हम उन्हीं इंद्र का मरुतों सहित आह्वान करते हैं।”

➡ऋग्वेद के मंडल 8 सूक्त 96 के श्लोक 13 मे लिखा है—

        "शीघ्र गतिवाला एवं दस हजार सेनाओं को साथ लेकर चलने वाला कृष्ण नामक असुर अंशुमती नदी के किनारे रहता था। इंद्र ने उस चिल्लाने वाले असुर को अपनी बुद्धि से खोजा एवं मानव हित के लिए वधकारिणी सेनाओं का नाश किया।"

➡ऋग्वेद के मंडल 8 सूक्त 96 श्लोक 14 में लिखा है—

          "इंद्र ने कहा- मैंने अंशुमती नदी के किनारे गुफा में घूमने वाले कृष्ण असुर को देखा है, वह दीप्तिशाली सूर्य के समान जल में स्थित है। हे अभिलाषापूरक मरुतो, मैं युद्ध के लिए तुम्हें चाहता हूं। तुम यु़द्ध में उसे मारो।"

➡ऋग्वेद के मंडल 8 सूक्त 96 श्लोक 15 मे लिखा है—

        "तेज चलने वाला कृष्ण असुर अंशुमती नदी के किनारे दीप्तिशाली बनकर रहता था। इंद्र ने बृहस्पति की सहायता से काली एवं आक्रमण हेतु आती हुई सेनाओं का वध किया।"

➡ऋग्वेद के मंडल 8 सूक्त 96 श्लोक 17 मे लिखा हैं —
  
        "हे बज्रधारी इंद्र! तुमने वह कार्य किया है। तुमने अद्वितीय योद्धा बनकर अपने बज्र से कृष्ण का बल नष्ट किया। तुमने अपने आयुधों से कुत्स के कल्याण के लिए कृष्ण असुर को नीचे की ओर मुंह करके मारा था तथा अपनी शक्ति से शत्रुओं की गाएं प्राप्त की थीं।"
👉मूल संस्कृत श्लोक देखें शांति कुंज प्रकाशन, गायत्री परिवार, हरिद्वार द्वारा प्रकाशित वेद में; अनुवाद-वेद, विश्व बुक्स, दिल्ली प्रेस, नई दिल्ली!!

👇अब बताएँ क्या कृष्ण और जाटव असुर थे? ऋग्वेद के इन श्लोकों पर कृष्णवंशी लोगों का ध्यान शायद नहीं गया होगा। यदि गया होता तो बहुत पहले ही तर्क-वितर्क शुरू हो गया होता।

👉चूँकी जाट-वंशी नन्द के पुत्र चन्द्र को काला होने के कारण विशेषण के तौर पर आर्य ब्राह्मणों ने उन्हें कृष्ण कह दिया। क्योंकि जिस तरह मोर्य पंख सबसे पहले कृष्ण ने धारण किया था, ठीक उसी तरह मोर्य-वंश के संस्थापक चन्द्र थे। कृष्ण और चन्द्र दोनों के पिता का नाम भी एक समान है— "नन्द"। अर्थात् चन्द्रमोर्य को ही कृष्ण कहा गया हैं । चन्द्र की माता— मोर्यी थी। इसलिए वे चन्द्रमोर्य कहलाए।

➡कलान्तर मे आर्य ब्राह्मणों ने चन्द्रमोर्य को कृष्ण चन्द्र मोर्य न कहकर उन्हें कृष्णचन्द्र कह दिया, जो मोर्य पंख धारन करने वाले थे। तात्पर्य यह है कि कृष्णचन्द्र मोर्य-पंख धारण करने वाले नही बल्कि मोर्य-सम्राज्य को धारण करने वाले चन्द्रमोर्य थे। जब गुप्तवंश के आर्य ब्राह्मणों ने छल से नन्द को उसके प्राजा समेत गुलाम बना लिया। तब उनके पुत्र कृष्ण (चन्द्र) और बलि ने अपने मामा वृष्णि (वृत्रासुर) के साहयता से आर्यों को खरेद कर पुन: राज्य हासील किया।

➡कृष्ण ने बार्बरीक आर्य ब्राह्मणों को मथुरा से खदेड़ दिया, वो भागकर पर्वतों पर जा बसे। फिर बदला लेने के लिए छुट-पुट आक्रमण करते रहे। 18 वर्षों के प्रयासों मे आर्यों ने एक दिन नदी के बाँध तोड़कर मथुरा को जल-मग्न कर दिया। जिसमें कितने मथुरावासीयों का जल-समाधी बन गया। कुछ को कृष्ण ने बचाकर अपने मामा गोवर्धन पर्वत के वर्धमान राजा कनिष्क के राज्य मे जा बसे। वहा भी आर्यो ने हमला करके कनिष्क की राज्य को गर्द मे मिला दिया। इस बार कनिष्क की हत्या करने के कुछ वर्षों बाद लव पाकर कृष्ण की भी हत्या कर दी गई।

➡आर्यों ने बेशक कृष्णचन्द्र मोर्य की हत्या कर उसे दुनिया से मिटा दिया, लेकिन जाट-सामाज के मन-मस्तिष्क से उसके छवि को नही मिटा सके। इसी कारण मोर्य-सम्राज्य के अंत के बाद आर्य-ब्राह्मणों ने जाटों से शिक्षा, सत्ता और संपति का अधिकार छिन लिया। फिर उसके इतिहासों को धुमील करने का प्रयास किया गया।

➡उपर्यूक्त वृष्णि वंशी जाटों की सच्चाई और इतिहास छुपाने के लिए आर्यों ने स्वयं को विष्णु और जाट-सामाज को जटायू कहा। फिर इसे महीमा-मण्डीत कर जटायू को विष्णु का सेवक, दास और वाहन कह दिया।

तात्पर्य यह हैं कि— जिस तरह वाहन चालक अपनी मर्जी से वाहन को जिधर-चाहें उधर घुमा सकता हैं, ठीक उसी तरह विष्णु अर्थात् आर्यों ने जटायू अर्थात् जाट-सामाज को सेवक, दास और वाहन अर्थात् "काठ की पुतली" बना रखा था। मतलब जाट-सामाज आर्यों की गुलामी और दासता में जी रहे थे।

➡भविष्य मे जाटों को अपनी अतित का भान न रहे, इसलिए आर्यों ने कृष्ण को विष्णु के अवतार कह दिया और जाट-सामाज को जटायू-पक्षी अर्थात् विष्णु के सेवक व दास कहकर महीमा-मण्डीत किया। जबकि कृष्ण विष्णु के अवतार नही बल्कि वृष्णि-वंशी जाट थे, जो जाट-सामाज के एक महानायक थे।

आर्यों ने वृष्णि वंशी माधव को मधु-असूर, केशव को केटव-असूर, विराट को वृत्रासूर, कृष्ण को कृष्णासूर इत्यादि कहा। साथ ही वृष्णि के अपभ्रंश विष्णु कहा वतथा वृष्णि जाट-सामाज को जटायू कह, उस पर भी कई तथाकथित कथाओं को रचकर जाटों के इतिहास को धुमील करने का प्रयास किया।

👉प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत में वेदव्यास ने कृष्ण को विजेता बताया है तथा इंद्र का पराजित होना दर्शाया है। इस आख्यान मे कृष्ण द्वारा इंद्र की पूजा का विरोध किया जाता हैं और प्राकृति पुजा की प्राथमिकता दी जाती हैं, जिससे कुपित इंद्र अतिवृष्टि कर मथुरावासियों को डुबों देने का प्रयास करता हैं । फिर कृष्ण गोवर्धन पर्वत के जरिए अपने लोगों को इंद्र के कोप से बचा लेते हैं। इंद्र थककर पराजय स्वीकार कर लेता है। इंद्र और कृष्ण के बीच लड़े गए इस युद्ध को कही भी आमने-सामने का युद्ध नही दर्शाया गया हैं। जबकी ऋग्वेद मे इस युद्ध को आमने-सामने का युद्ध ठहराया गया हैं । साथ ही ऋग्वेद अति प्राचिन होने के कारण महाभारत से ज्यादा प्रमाणित हैं। जिससे स्पष्ट होता हैं कि— कृष्ण चन्द्रमोर्य के इतिहासों को महीमा मण्डीत करके छुपाने का प्रयास किया गया हैं।

➡क्योंकि यदु-कुल श्रेष्ठ कृष्ण का रंग काला था, वे गाय वाले थे, उन्हें गोवर्धन पर्वत को भी धारण करना पड़ा और यमुना तट के पास उनकी सेनाएं भी थीं। ठीक इसी प्रकार वेद के असुर कृष्ण के पास भी सेनाएं थीं। अंशुमती अर्थात् यमुना नदी के पास उनका भी निवास था और वह भी काले रंग एवं गाय वाले थे। उनका भी गोर्वधन गुफा में बसेरा था। साथ ही यदुवंशी कृष्ण एवं असुर कृष्ण दोनों का इंद्र से विरोध था। दोनों यज्ञ एवं इंद्र की पूजा के विरुद्ध थे। इस प्रकार वेद और पुराण के कृष्ण मे इतनी समता अकारण ही नही आपितु दोनों एक ही हैं, जिसे बाद मे आर्य ब्राह्मण द्वारा जाट-सामाज के इतिहासों को छुपाने के लिए पुराणों मे महीमा मण्डीत किया गया हैं।

👉ऋग्वेद में वर्णीत कृष्ण एवं इंद्र का यमुना के तीरे युद्ध होना, कृष्ण की गर्भिणी पत्नियों की हत्या, सम्पूर्ण सेना की हत्या, कृष्ण की काली छाल नोचकर उल्टा करके मारने और जलाने, उनकी गायों को लेने की घटना इस देश के आर्य-अनार्य युद्ध का ठीक उसी प्रकार के एक हिस्सा है, जिस प्रकार महिषासुर, रावण, हिरण्यकश्यप, राजा बलि, बाणासुर, शम्बूक, बृहद्रथ के साथ छलपूर्वक युद्ध करके उन्हें मारने की घटना को महिमा मंडित किया जाना। इस देश के मूल निवासियों को गुमराह करने वाले पुराणों को ब्राह्मण आर्यों ने इतिहास की संज्ञा देकर प्रचारित किया। ताकि मूलनिवासीयों के इतिहासों को धुमील किया जा सके।

👇उपर्यूक्त जाट-सामाज अपभ्रंश के चलते जाटव, जाटु, जादु, जादव, यादव इत्यादि नामों से प्रचलित हुए।

➡आज वही जाट-सामाज हजारों जाट-वर्णों मे बट चूका हैं। अपभ्रंश के चलते आज 👉"आभीर जाट" के जगह 👉"अहीर जात" कहलाने लगा हैं । उसी प्रकार जाट-सामाज वर्तमान मे भील, निषाद, कायस्थ, सोनार, कोईरी, कुर्मी, कानु, नोनिया, बिन्द, तुरहा, तेली, पासी, महार, डोम, चमार इत्यादि हजारों जाट-वर्णों मे बटकर अपभ्रंश के चलते 👉"जाट" के जगह 👉"जात" कहलाने लगा हैं ।

अर्थात्
➡भिल-जाट के जगह   ▶भिल-जात,
➡निषाद-जाट के जगह ▶निषाद-जात,
➡बिन्द-जाट के जगह   ▶बिन्द जात,
➡डोम-जाट के जगह    ▶डोम जात,
इत्यादि जाट को ही जात कहा जाने लगा हैं।

👉मतलब "जाट" के जगह "जात" अपभ्रंश पैदा करके आर्य-ब्राह्मणों ने बड़ी आसानी से बौद्ध श्रमण जाट-सामाज के लोगों को ऊँच-नीच व भेद-भाव का उल्टा चश्मा पहना रखा हैं ।

जागों जाटवों जागों, जागों यादवों जागों और अँधविश्वास का यह उल्टा चश्मा निकाल फेकों। जानकर भी अंजान मत बनों। एक हो जाओं। तुम सभी SC, ST और OBC भारत के सच्चे मूलनिवासी हो, जो एक ही श्रमण जाट-सामाज के अभिन्न-अंग हो। तुम हिन्दु नही हो, तुम पारसी भी नही और तुम यहुद्दी भी नही हो। बल्कि तुम सिख हो, तुम इसाई हो, तुम इस्लाम हो, तुम जैन हो, तुम लिंगायत हो, तुम कबीरपंथी हो और तुम सभी बौद्ध-श्रमण संस्कृति का अभिन्न अंग हों, जो आज बिखर चुके हो।

👉ध्यान रहे कि मुहम्मद हजरत साहब भी एक जाट थे, जो आर्यो के जन्म-प्रधान मानने वालेे वैदीक धर्म के खिलाफ थे। लेकिन वो कर्म-प्रधान मानने वाले बौद्ध श्रमण-धम्म के पक्षधर थे। इसलिए आर्यों ने बौद्ध-श्रमण संस्कृति को खत्म करने के उदेश्य से हजरत साहेब के अनुयायी बनकर गलत तरीकों से इस्लाम का प्रचार किया। लेकिन मुहम्मद साहेब के कुछ अच्छे जाट-अनुयायी भी रहे, जिसके चलते इस्लाम में कर्म की प्रधानता आज भी मौजूद हैं। यही कर्म की प्रधान्ता इस्लाम को श्रमण जाट-सामाज से जोड़ती हैं। बाकी इसमें जो भी तथाकथित रिवाजे बलि-प्रथा, पर्दा-प्रथा इत्यादि जैसी कुप्रथाए है, वो सभी आर्यों द्वारा इसमें घुसपैठ करके इन्हें भटकाने का नतिजा हैं। इस प्रकार आर्यों ने "जाट-समाज" को वर्णो के अलावे कई धर्मों मे भी तोड़ने का काम किया।

👉कृष्ण एक कर्मयोगी थे या कहे तो एक श्रमयोगी थे। उन्होंने कहा कि कर्म ही पुजा है या कहे तो श्रम ही पुजा हैं। कर्म श्रम का ही प्रयावची है। अत: कृष्ण कर्मयोगी थे मतलब वो एक बौद्ध श्रमन थे। क्योंकि कर्म की प्रधान सिर्फ श्रमण सामाज के लोग ही देते हैं न कि हिन्दु...?

➡कृष्ण के अनुसार लोगों की योग्यता व श्रेष्टता उसकी नेक और महान कर्मों से आकी जाती हैं।

➡जबकि हिन्दुओं के गुरू ब्राह्मणों के अनुसार किसी भी कर्मो का कोई महत्व नही। पाप या अपराध हो गया तो ब्राह्मणों की झोली भर दो अथवा अँधविश्वासी बनकर गंगा स्नान कर लो।

ब्राह्मणों के अनुसार जन्म और कुल का महत्व हैं। तभी ब्राह्मण सबसे श्रेष्ट कहलाता है। भले ही वह नीच कर्म वाला, गुण्डा, मवाली एवं अशिक्षित ही क्यों न हो, जन्म से ब्राह्मण होने के कारण वह स्वयं को श्रेष्ट कहता हैं। वही एक शुद्र कुल मे पैदा हुआ व्यक्ति किताना भी विद्वान क्यों न हो जाये, वह वर्ण व्यवस्था मे नीच हैं, तो नीच ही रहेगा।

जबकि कृष्ण ने कर्म को ही श्रेष्ट कहा।

कहा। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता हैं कि कृष्ण को कर्मयोगी होने के नाते जन्म को प्रधान मानने वाले हिन्दु-धर्म से कोई नाता नही। बल्कि सातिर आर्यों ने महानायक कृष्ण के जाट-समाज को भ्रमित कर रखा हैं ।

🕚कौआ वाहन—
कोल-सामाज के नायक काकोल थे। तब कोल-सामाज काकोल के इसारों पर ही चलता था। लेकिन कपट से आर्यों ने काकोल की राज्य हरप ली। तब काकोल ने अपने साथी शनि की सरण लिया। शनि ने काकोल-सामाज को आर्यों की गुलामि से आजाद कराई। लेकिन काकोल आर्यों के द्वारा मारा गया। फिर कोल-सामाज ने शनि को अपना न्यायाधिस अर्थात् स्वयंभूव चुना। शनि ने अपनी मेषमति राज्य के साथ-साथ कोल-सामाज का भी कार्य भार संभाला। उसने हरिचन्द्र को आर्यों द्वारा छिना हुआ राज्य वापस दिलाया। कलान्तर में आर्यों ने मेषमति और कोल दोनो राज्यों पर कब्जा कर शनि को बेदखल कर दिया । फिर शनि अपने मामा रावण की शरण ली। वहा हून (हनुमान) आर्यों ने आक्रमण करके शनि की हत्या कर डाली। फिर आर्यों ने शनि को नीलासुर, नीलध्वज, प्रेतराज, रंभासूर इत्यादि कई नामों से संबोधित किया। साथ ही कोल-सामाज को कौआ और शनि का वाहन बनाकर प्रस्तुत किया गया। ताकी कोलियों के इतिहासों को धूमील किया जा सके।

🕚भैंस वाहन—
शनि की पत्नी महीषी के पुत्र महीष्यमत की हत्या करके आर्यो ने मेषमति पर कब्जा कर लिया और मेहीष्यमत की इतिहासों को धुमिल करने के उदेश्य से महीषासुर कहा। कलान्तर में महीषासुर से उसे भैंसासूर कहकर प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार मेष-सामाज को आर्यों द्वारा भैंस कह शनि और उसके पुत्र महीष्यमत की वाहन बनाकर प्रस्तुत किया गया।

🕚मोर वाहन—
बौद्धीसत्व शिव के पुत्र कार्तिकेय (कृतविर्य) मौर्य-सामाज के प्रथम स्वयंभूव थे। इसलिए इन्हें मोर्यगन अथवा मुर्गन भी कहा जाता हैं । इनके समय मे ही आर्य हूनों ने सबसे ज्यादा आक्रमण किया था, जिसका सामना इन्होंने डट कर किया। कलान्तर मे हून स्कन्द/स्कीन्द्र (सिकेन्दर) ने मोर्य-समाज पर कब्जा कर लिया। फिर कार्तिकेय के इतिहासों को बिगाड़ने के लिए ही कलान्तर मे हून आर्यों द्वारा मौर्य-सामज को कार्तिकेय का मोर वाहन बनाकर प्रस्तुत किया गया।

🕚मूस वाहन—
हून आर्य माउस को कार्तिकेय के भाई बुद्ध ने अपनी चतुराई और बुद्धी से परास्त कर दिया था। लेकिन हून आक्रांता रूद्रादमन ने एकान्त पाकर उसकी हत्या कर दी। फिर इनके इतिहासों को बिगाड़ने के लिए इन्हें गजासूर, गजानन इत्यादि कहा। साथ ही इस बार मौर्य-सामज के लोगों को मूश कह स्वयं गणेश बन आर्यों ने बुद्ध की इतिहासों को धुमील करने की प्रयास किया।

🕚नन्दी/बैल वाहन—
बुद्ध के परम शिष्य आनंन्द ने पुन: मौर्य-सामज को अपने बस मे किया तथा सिकेन्दर को मार भागया। लेकिन कौटिल्य आर्य ब्राह्मण ने छल-कपट से नन्द के नौ पुत्रों की हत्या करके उसके राज्य पर कब्जा कर लेता हैं । फिर नन्द के इतिहासों को बिगाड़ने के उदेश्य से आर्यों द्वारा उसे शिव के वाहन नन्दी अर्थात् बैल कहकर संबोधित किया जाता हैं।

🕚दशानन्द/रावण—
हून आर्य कौटिल्य से मौर्य-सामज को पुन: नन्द के पुत्र चन्द्र/कृष्ण और वृष्ण मिलकर छोरा लेते हैं । चन्द्र का प्रधानमंत्री वृष्ण बनते हैं । यहा से सहदेव तक दत दस राजा होते हैं, जिनकी हत्या करके दशानन और रावण कहा जाता हैं। ताकी इनकी इतिहासों को भी धुमिल किया जा सके।

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