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ऋग्-भेद: भाग—1/2

!!1!! आर्यों ने अग्नि-हवन परम्परा के बाद निराकार प्राकृति को साकार स्वरूप इंसान को "वायु देव" बनाकर उसे पुजने की परम्परा बनाई। साथ ही प्रशाद के रूप में श्रमणों के समक्ष नसीले सोमरस (भांग) को प्रस्तुत किया।

!!2!! उसने सोमरस (भांग) को परम शुद्ध बताया और अशिक्षित श्रमणों के साथ वायुदेव की स्तुति करके सोमरस का वितरण किया।

!!3!! फिर ऋत्विज आर्य द्वारा स्वयं को वायुदेव  बताकर श्रमणों को सुनाते हुए सोमरस की प्रसंसा की गई। ताकी श्रमणों को सोमरस (भाँग) पीने की लत लगायी जा सके।

!!4!! इसके बाद आर्यों ने वायुदेव के साथ-साथ इन्द्रदेव को भी साकार रूप मे पुजने की परम्परा बनाई। उसने पहले की भाँति षड्यंत्र रचा और पुन: दुसरे ऋत्विज आर्य इन्द्र को वर्षा कराने वाले देव कहकर संबोधित किया। फिर सभी आर्यों ने एक मत होकर ऋत्विज आर्य वायु और इन्द्र को बताया की सोमरस निति सफल (तैयार) होते ही सोमरस स्वयं तुम्हारी अभिलाषा करेगी। अर्थात्  श्रमणों को नसे की लत लगते ही वो स्वयं हमारे पास सोमरस के लिए आयेंगे। फिर श्रमणों से स्वर्ग हासील करने की अभिलाषा सिघ्र ही पूर्ण होगी।

!!5!! ऋत्विज आर्य वायु और इन्द्र को उसके लोगों ने समझाया कि सोमरस-निति अर्थात् श्रमणों को नसेरी बनाने की निति सफल (तैयार) ही मानो। बस ध्यान रहे की हम अन्नयुक्त और सुख-सुविधा सम्पन्न देश मे बसे है । इसलिए तुम दोनों यज्ञ के समीप देवों के रूप बनाकर सिघ्र ही प्रस्तुत हो जाना, ताकि श्रमणों को यकिन हो जायें कि तुम दोनों ईश्वर हो।

!!6!! यजमान अर्थात् श्रमण लोग भी यदि सोमरस युक्त यज्ञ करे, तो भी तुम दोनों उसके पास चले जाना। तुम दोनों को वहा प्रस्तुत होने से श्रमणों को विश्वास हो जायेगा कि तुम ईश्वर हो और सिघ्र ही हमारी यज्ञकर्म अर्थात् षड्यंत्र सफल (पूरा) हो जायेगा ।

!!7!! अग्नि, वायु, इन्द्र और सोम से संबंधित षड्यंत्र सफल हो जाने के बाद ऋत्विज आर्यों द्वारा आसमान से जल लाने वाले देव के रूप मे मित्र और वरूण को संबोधित किया गया। जब कुछ शिक्षित श्रमण लोग इनके षड्यंत्रों का भण्डाफोर करने लगे, तो आर्य वरूण को हिंसको को सजा देने वाले देव के रूप मे प्रस्तुत किया गया। ताकि कोई हिंसा न करे और सहज ही उनका षड्यंत्र सफल हो जाये।

!!8!! फिर मित्र और वरूण को यज्ञ-फलदाता बताया जाने लगा। ताकी पहले से जो श्रमण अग्नि, वायु और इन्द्र के नाम पर यज्ञ करते आए हैं, उन सभी यज्ञों के फल प्राप्ति हेतू मित्र और वरूण को भी पुजने व मानने लगे।

!!9!! जो श्रमण मित्र और वरूण को ईश्वर मानने लगे, उसे आर्यों द्वारा बुद्धीमान कहा जाने लगा और जो श्रमण उसे नही मानते, उन्हें मूर्ख कहकर ताना दिया गया। साथ ही वरूण को बल और कर्म का रक्षक भी बताया गया, ताकि अन्य श्रमणों द्वारा इन्हें माना जा सके।

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